बिहार में संथाल विद्रोह के इतने बड़े पैमाने पर सतत रूप धारण करने के मूल कारण एवं परिणाम

बिहार में संथाल विद्रोह के कारण

अंग्रेजो के खिलाफ अनेक संघर्ष वन वसियों एवं जनजातियों द्वारा किया गया इसमें से संथाल विद्रोह सबसे अद्वितीय था संथाल विद्रोह की शुरुआत 1855- 56 में हुआ जो वर्तमान बिहार एवं झारखंड का क्षेत्र पड़ता है यद्यपि राजमहल की पहाड़ी के आसपास के क्षेत्र अधिक प्रभावित रहे स्वतंत्रता प्रिय एवं परंपरागत रीति रिवाज को मानने वाले संथाल जनजाति के लोग आधुनिक छोटा नागपुर के दक्षिण में बसे हुए थे लेकिन 1793 की भूमि के अस्थाई बंदोबस्त से यहां भूमि जमीदारों की हो गई जिसके कारण राजमहल के पहाड़ियों के आसपास चले गए

उस क्षेत्र को कठिन परिश्रम से खेती-बाड़ी को योग बनाया लेकिन इस भूमि पर जमींदारों ने अपने दावे करने लगे इसके साथ ही नील की खेती से इनका अंग्रेजों से टकराव बढ़ गया था यह पुलिस के द्वारा दमन और अत्याचारी के शिकार हो गए इतना ही नहीं इन दिनों पूर्वी क्षेत्र में रेल निर्माण चल रहा था रेलवे अधिकारी एवं कर्मचारी इनमें मनमानी करने लगे और महिलाओं की बेइज्जती भी करते थे इन अत्याचारों ने भयंकर असंतोष रूप ले लिया जो 18 55 – 56 में एक विद्रोह के रूप में प्रकट हुआ जिनमें में भागलपुर मानभूम राजमहल जनजाति ने भी भाग लिया!

संथाल विद्रोह के परिणाम

प्रारंभ में संस्थानों ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा करते हुए जमींदार महाजनों पुलिस एवं अधिकारियों पर हमला किया एवं उनकी हत्याएं की उसके साथ-साथ रेलवे स्टेशन डाकघर पुलिस एवं फैक्ट्रियों पर आक्रमण किए उन्होंने भागलपुर राजमहल के मध्य डाक तार एवं रेल सेवाओं को ठप कर दिया जिसके परिणाम स्वरूप अंग्रेजों ने विद्रोह का दमन करना प्रारंभ किया एवं क्षेत्र में मार्शल लॉ लगा दिया

संस्थानों के नेता सिंधु एवं कानून सहित लगभग इसमें 10,000 संथाल मारे गए विद्रोह धीरे-धीरे शांत हो गया तो इस क्षेत्र में शासन सीधे भारत के गवर्नर जनरल के हाथों में दे दिया गया इस क्षेत्र को संथाल परगना का नाम दिया गया और संथाल को विशेष सुविधा के बहाने इसे एक वहीं क्षेत्र घोषित कर दिया गया शासन ने सैनिक अभियान पुलिस दमन के साथ-साथ ईसाई मिशनरियों का भी सहारा लिया भारतीय जनता से इन वनवासियों को अलग कर दिया गया परंतु इस क्षेत्र में ईसाई पादरियों को जाने की छूट दी गई और उन्हें प्रोत्साहित किया गया

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