पाल वंश का संस्थापक गोपाल था जिसने बिहार में भी अपनी शासन को विस्तार किया बालों को लंबे शासन के दौरान शांति एवं समृद्धि बनी रही जिसके फलस्वरूप कला के सभी क्षेत्रों में प्रगति हुई पाल कला के अवशेष बिहार में प्रचुरता से मिले हैं!

मूर्तिकला

पाल काल में कांस्य एवं प्रस्तर मूर्ति कला की एक नई शैली का उदय हुआ है इसके मुख्य प्रवर्तक धीमन एवं बीठपाल थे जो धर्मपाल एवं देव पाल के समकालीन थे पाल कालीन कांस्य मूर्तियां डलवा किसने की थी इसके सर्वोत्तम नमूने नालंदा के तथा गया के निकट कुकरी हार से प्राप्त हुए हैं! यह सभी मूर्तियां मुख्य रूप से बुद्ध ,बोधिसत्व ,अवलोकितेश्वरा, मंजूश्री, मैत्रेय तथा तारा की है इसमें कुछ हिंदू देवी देवताओं की भी मूर्तियां है!

पाली के पत्थर की मूर्तियां काले बेसाल्ट पत्थर की बनी हुई है समानता इन मूर्तियों में शरीर के आगे का भाग को दिखाने पर ध्यान दिया जाता है इनमें अलंकरण की प्रधानता है इनमें बुध एवं विष्णु को मूर्तियां की प्रधानता है सब एवं जैन धर्म का प्रभाव सीमित रहा है सभी मूर्तियां अत्यंत सुंदर अलंकार प्रधान एवं कला की परिपक्वता को दर्शाती है कलात्मक सुंदरता का एक अन्य उदाहरण एक तख्ती है जिस पर श्रृंगार करती हुई एक स्त्री को दिखाया गया है!

चित्रकला

पाल कला में तार पत्र एवं दीवार पर चित्र बनाने के उदाहरण मिले हैं इनमें लाल नीले काले उजले रंगों का प्राथमिक रंग और हारे बैगनी हल्के गुलाबी तथा भूरे रंग के द्वितीय रंग के रूप में प्रयोग हुआ है पाल चित्रकला पर तांत्रिक प्रभाव स्पष्ट झलकता है चित्रकला का एक रुप भित्ति चित्र भी है इस जिसके नमूने नालंदा से प्राप्त हुए हैं यह चित्र अब धुंधले पड़ चुके हैं किंतु उनकी अजंता एवं बाग की भित्ति चित्रात्मक परंपराओं से समानता स्पष्ट करता है!

स्थापत्य कला

पाल स्थापत्य कला मुख्यता ईद पर आधारित थी इनके साथ उदंतपुरी नालंदा एवं विक्रमशिला महाविहार में है पाल शासक गोपाल द्वारा उदंतपुरी में एक महावहार एवं मठ बनवाया गया था यद्यपि इसके अवशेष सुरक्षित नहीं है नालंदा में मंदिर स्तूप एवं विहार बनवाए गए

धर्मपाल ने नालंदा विश्वविद्यालय का पुनरुद्धार किया एवं उसका खर्च चलाने के लिए 200 गांव की आमदनी उसे दान में दे दी तथा भागलपुर में विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना कि जो कालांतर में नालंदा के बाद सबसे विख्यात विश्वविद्यालय के रूप में उभरा यहां ईट से निर्मित मंदिर एवं स्तूप के अवशेष मिले हैं इनके पत्थर पर मिट्टी की बनी गौतम बुध की विशाल मूर्तियां है जावा के शैलेंद्र एवं स्तूप के अवशेष मिले हैं इनमें पत्थर एवं मिट्टी की बनी गौतम बुध की विशाल मूर्तियां हैं जावा के शैलेंद्र वंश शासक बाल पुत्र देव नेपाल शासक देव पाल से अनुमति लेकर नालंदा में एक बौद्ध विहार का निर्माण कराया था!

अतः कालों के काल में एक उन्नत कला एवं स्थापत्य का विकास हुआ जो इससे राजनीतिक और मजबूत आर्थिक स्थिति के साथ-साथ शासकों के रचनात्मक एवं कला के प्रति उनकी रुचि को प्रदर्शित करता है तथा शासक बौद्ध धर्म के अनुयाई थे अतः इसके काल पर बौद्ध प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखता है!

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