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           अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण से संबंधित निम्नलिखित समझौते या सम्मेलन किए गए-

जेनेवा प्रोटोकॉल:1925-

1925 में रासायनिक और जैविक हथियारों का निषेध करने के लिए जेनेवा प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किया गया। परंतु इस प्रोटोकॉल का ध्यान न रखते हुए द्वितीय विश्व युद्ध में जापान ने चीन में प्लेग के जीवाणु द्वारा प्रदूषण फैला दिया। ऐसे विनाशकारी प्रभाव को संयुक्त राष्ट्र संघ के देखरेख में नियंत्रित करने के लिए 10 अप्रैल 1972 को जब हथियार सभा के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर हुआ। लेकिन जैव प्रयोगशालाओं के निरीक्षण की व्यवस्था ना होने के कारण यह समझौता प्रभावी रहा।

स्टॉकहोम समझौता- संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वाधान में 5 जून, 1972 को स्टॉकहोम में पर्यावरण सुरक्षा हेतु विश्वव्यापी स्तर पर प्रथम प्रयास किया गया और इस सम्मेलन में “संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम(UNEP)”का आरंभ हुआ। UNEP का मुख्यालय नैरोबी  में स्थित है। इस सम्मेलन में ही 5 जून को”विश्व पर्यावरण दिवस”घोषित किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण के प्रति राजनीतिक चेतना जागृत करने और आम जनता को प्रेरित करना था। इस सम्मेलन में पर्यावरण संकट को दूर करने के लिए 25 सूत्री घोषणा पत्र भी तैयार किया गया।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम(UNEP)-

इसकी स्थापना 1972 में स्टॉकहोम सम्मेलन में की गई थी, इसका मुख्यालय नैरोबी (केन्या) में स्थित है। यह संयुक्त राष्ट्र संघ की महत्वपूर्ण एजेंसी है जो संपूर्ण विश्व में पर्यावरण संरक्षण के लिए विभिन्न उपायों के लिए उत्तरदाई है इसी एजेंसी द्वारा”ग्लोबल-500 पुरस्कार”प्रदान किया जाता है।

साइट्स(C.I.T.E.S.)-

इसका पूरा नाम Conservation of international trade in Endangered species of wild fauna and Flora, 1973 में यह सम्मेलन वाशिंगटन में हुआ था। परंतु या 1976 से लागू हुआ।”यह विश्व का सबसे बड़ा वन्य जीव संरक्षण समझौता है”। यह सम्मेलन जीवों तथा उनके अंगों आदि के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रतिबंधित करता है । या विभिन्न राष्ट्रों को निर्देश भी देता है कि वे अपने राष्ट्र में जीव व्यापार पर नियंत्रण रखें।

आधारी समझौत-

1980 के मध्य तक प्लास्टिक, कूड़ा, धातु की कत्ल में रासायनिक निकासी आज के व्यापारियों को प्रतिबंधित करने करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समझौते की मांग होने लगी थी। परिणामस्वरूप 1989 में”खतरनाक नृत्य मित्र की सीमा पर आवागमन और उनके निपटारे के लिए आधारी समझौता”संपन्न हुआ। लेकिन यह समझौता पूर्णरूप से सफल नहीं हुआ।

वियना समझौता-
वियना  कन्वेंशन 1985 में वियना (ऑस्ट्रिया) में हुआ था। यह समझौता ओजोन परत के संरक्षण हेतु किया गया था, जो ओजोन छरण पदार्थों (ODS) पर संपन्न प्रथम सार्थक प्रयास था। परंतु या समझौता 1988 में लागू किया गया था। पुनः दिसंबर, 1995 में संपन्न वियना में ओजोन रिक्तकारक पदार्थों पर एक समझौता हुआ। इस ओजोन परत के बढ़ते चरण को कम करने के लिए तीन”ODS, पदार्थों ,C.F.C.,HCFC, और मिथाइल ब्रोमाइड की कटौती पर शर्तें तय की गई।

 

मोंट्रियल समझौता(1987)-

यह समझौता, ओजोन परत को क्षरण करने वाले पदार्थों के बारे में अंतरराष्ट्रीय संधि है जो ओजोन परत को संरक्षित करने के लिए चरणबद्ध ढंग से उन पदार्थों का उत्सर्जन रोकने के लिए बनाई गई है जिन्हें ओजोन परत को शुरू करने के लिए उत्तरदाई माना जाता है। इस संधि पर हस्ताक्षर 16 सितंबर,1987 को हुआ था तथा  1 जनवरी,1989 को चुनाव हुआ। जिसकी पहली बैठक मई, 1989 में हेलसिंकी में हुई। ओजोन परत के संरक्षण से संबंधित लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए”16 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय दिवस घोषित किया गया”।

ऐसा अनुमान है कि यह इस समझौते का पूरी तरह से पालन हो तो वर्ष 2050 तक को जोड़ दर्द ठीक हो सकती है।

क्योटो प्रोटोकॉल(1997)-

संयुक्त राष्ट्र संघ की पहल पर ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिए 1992 में ‘यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज'(UNFCCC) अस्तित्व में आया।

ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में अनियंत्रित वृद्धि को रोकने के लिए बनाया गया था। 11 दिसंबर, 1997 को हुए (UNFCCC) के तीसरे सम्मेलन अर्थात (cop) के तीसरे सत्र में क्योटो प्रोटोकोल को स्वीकार किया गया।

क्योटो प्रोटोकॉल 16 फरवरी, 2005 को पूर्ण रूप से लागू किया गया। भारत ने अगस्त 2002 में क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किया।

किगाली समझौता-

यह समझौता 15 अक्टूबर, 2016 को रवांडा  किगाली शहर में हुआ था।

खतरनाक ग्रीन हाउस गैसों,मुख्य रूप से HFC’S or HCFC’S के उत्सर्जन में कटौती हेतु समझौता था।

HFC के उत्पादन पर नियंत्रण के साथ-साथ इसके कारोबार पर लगाम लगाने की योजना बनाई गई और 15 अक्टूबर,2016 को रवांडा के किगाली में भारत सहित 197 देशों द्वारा इसे मान्यता मिली।और 1 जनवरी 2019 से लागू हुआ।

इस समझौते में तीन अलग-अलग कार्यक्रम तय किए गए-

(1) यूरोपीय संघ, अमेरिका तथा जापान जैसे विकसित देश HFC गैसों के उत्पादन और उपभोग को 2019 के प्रारंभ तक बंद करेंगे तथा 2036 तक उसके उपयोग में वर्ष 2012 के स्तर से 85% तक की कमी लाएंगे।

(2) भारत, ईरान, इराक, पाकिस्तान व अन्य देश HFC के प्रयोग को 2028 तक रोकेंगे और 2047 तक वर्ष 2025 के स्तर से 85% तक की कमी लाएंगे।

(3) चीन,ब्राजील और अफ्रीका के देश HFC पर 2024 तक रोक लगाएंगे और इसे 2045 तक 2021 के स्तरों के 80% तक कमी लाएंगे।

बेलाजियो घोषणा-पत्र-

यह दस्तावेज 2002 में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने के लिए जारी किया गया था, जिसे बेलाजियो घोषणा पत्र कहा जाता है।

एनर्जी फाउंडेशन (अमेरिका) को ध्यान में रखकर बेलाजियो शहर में आयोजित किया गया था। इस घोषणापत्र के 43 प्रमुख सिद्धांत बनाए गए थे।

 

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